नई दिल्ली: LBSNAA निदेशक श्रीराम तरणिकांति का ISS प्रशिक्षुओं से संवाद: डेटा-आधारित नीति और नेतृत्व पर दिया जोर, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी के निदेशक श्रीराम तरणिकांति नेने शनिवार (18 अप्रैल, 2026) को National Statistical Systems Training Academy में भारतीय सांख्यिकी सेवा (ISS) के 2024, 2025 और 2026 बैच के प्रशिक्षु अधिकारियों (ओटी) के साथ एक विस्तृत संवाद किया।

कार्यक्रम की शुरुआत क्षमता विकास प्रभाग के अतिरिक्त महानिदेशक आर. राजेश द्वारा स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने निदेशक का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि उनका यह दौरा युवा लोक सेवकों को प्रेरित करने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। उन्होंने मंत्रालय द्वारा किए जा रहे संगठनात्मक सुधारों, क्षमता निर्माण और जनसंपर्क पहलों का भी उल्लेख किया तथा NSSTA और LBSNAA के बीच सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया।
अपने संबोधन में तरणिकांति ने सिविल सेवकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि प्रभावी शासन के लिए साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने ISS अधिकारियों की भूमिका को “निस्वार्थ सेवा” बताते हुए कहा कि उनका कार्य नीति निर्माण में महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक इनपुट प्रदान करता है, जिसका प्रभाव व्यापक स्तर पर समाज तक पहुंचता है। उन्होंने प्रशिक्षु अधिकारियों को पारंपरिक प्रशासनिक कार्यों तक सीमित न रहकर मुख्य सांख्यिकीय गतिविधियों में सक्रिय रूप से योगदान देने के लिए प्रेरित किया। पेशेवर उत्कृष्टता पर जोर देते हुए उन्होंने सुझाव दिया कि अधिकारी अपने कार्य का कम से कम 30% हिस्सा नवाचार, नए विश्लेषण और शोध कार्यों में लगाएं। उन्होंने कहा कि निरंतर आत्मसुधार ही प्रभावी सार्वजनिक सेवा की कुंजी है।

एक सफल सिविल सेवक के गुणों पर चर्चा करते हुए उन्होंने “शाश्वत आशावादी” बने रहने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि सहानुभूति, स्पष्ट निर्णय क्षमता, टीम को प्रेरित करने की योग्यता और बदलती परिस्थितियों में अनुकूलता, प्रभावी नेतृत्व के लिए आवश्यक हैं। उन्होंने प्रशिक्षुओं को सांख्यिकी को केवल तकनीकी विषय न मानकर उसे जमीनी स्तर तक पहुंचाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सर्वेक्षण जैसे कार्यों को जिला प्रशासन और स्थानीय हितधारकों के साथ सहयोग के अवसरों में बदलना चाहिए, ताकि नीति निर्माण और क्रियान्वयन अधिक प्रभावी हो सके।
उन्होंने लोक सेवा को केवल औपचारिक जिम्मेदारी तक सीमित न रखते हुए व्यापक सामाजिक भलाई के लिए समर्पित रहने की प्रेरणा दी। साथ ही प्रशिक्षुओं को “कर्मयोगी” और “स्थितप्रज्ञ” दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी, जिससे वे अपने कर्तव्यों को निष्पक्षता और समर्पण के साथ निभा सकें।









