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नई दिल्ली:महिला आरक्षण पर फिर सियासत भारी: नारी शक्ति वंदन विधेयक पास न होने से बढ़ी चिंता

नई दिल्ली: क्या नारी वंदन अधिनियम से भी परेशानी हैं?

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(चन्दन कुमार)

नई दिल्ली:महिला आरक्षण पर फिर सियासत भारी: नारी शक्ति वंदन विधेयक पास न होने से बढ़ी चिंता,भारत के इतिहास में ऐसा देखा जाता है कि, यहां के सभी राजनीतिक दल महिलाओं के सम्मान और अधिकार की बात करने मे कभी नहीं थकते हैं। लेकिन जब इन राजनीतिक दलों के समक्ष महिलाओं के अधिकार और सम्मान देने का समय आता है, तो उसमे इनकी रुचि कम देखी जाती है। सभी दल जुबानी रूप से महिलाओं के समर्थक है, लेकिन जब उनको चुनाव के लिए टिकट देने की बात आती है तो, इस मामले मे सभी दलों का ट्रेक रिकार्ड खराब ही पाया गया है। जब भी महिलाओं को मौका मिलने वाला होता है उस समय किसी न किसी रूप में कोई अड़चन पैदा हो ही जाता है। शायद यहीं वजह है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी महिलाओ को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया हैं।
हाल के दिनों मे भारतीय लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर कहे जाने वाले संसद भवन मे उस समय देखने को मिला। जब सरकार के तरफ से संसद का विशेष सत्र बुलाकर संविधान संशोधन 131 के तहत नारी शक्ति वंदन अधिनियम विधेयक लाया गया। जिसका उदेश्य था महिलाओं को लोकसभा और विधानसभा मे 33 प्रतिशत आरक्षण देना। इससे महिलाओं को विधानसभा और लोकसभा मे प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जा सकता था। इस विधेयक के पारित होने मात्र से सभी दलों को चुनाव के समय महिला प्रत्याशी देना ही होता ऐसी बद्धता हो जाती।
शुक्रवार को जब इस विधेयक को पारित करने के लिए संसद मे वोटिंग की गई उस समय लोकसभा मे 528 सांसद मौजूद थे और बिल पास होने के लिए 352 सांसदों की सहयोग की जरूरत थी। जिसमें से मात्र 298 सांसद का ही सहयोग मिला। जबकि विपक्ष को 230 लोगों का सहयोग मिला। इस कारण से यह बिल पास नहीं हो पाया। इस तरह सरकार 54 वोट से चूक गई और नारी शक्ति वंदन अधिनियम हकीकत नहीं बन पाया।
इसके बाद से पक्ष विपक्ष का एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का तीर चलने लगा, सोशल मीडिया पर अपने अपने पक्ष रखे जाने लगे।
इसके बाद से पक्ष विपक्ष का एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का तीर चलने लगा, सोशल मीडिया पर अपने अपने पक्ष रखे जाने लगे। पर वास्तविकता यहीं है कि एक बार फिर से महिलाओं के हक हुकूमत की बात करने वाले लोग ही उनके हकों को रोक दिया। इसका नतीजा यह होगा कि अब – इस बिल के गिरने का अर्थ है कि 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण शायद अब लागू न हो पाए। अब 2026-27 की नई जनगणना के आंकड़े आने तक परिसीमन की प्रक्रिया शुरू नहीं हो सकेगी, और महिला आरक्षण को लेकर भी आगे नहीं बढ़ा जा सकेगा। ऐसे में जानकार मानते हैं कि 2033 से पहले महिला आरक्षण राजनीति में लागू होना मुश्किल है। ऐसे में नारी शक्ति वंदन का जो सपना सरकार ने संजोया था उस पर ब्रेक लग गई है।

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Ib News
Author: Ib News

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