डॉ दीपक शर्मा
नई दिल्ली: सूर्य के कोरोना में छिपी अशांति का पता लगाने में भारतीय वैज्ञानिकों को बड़ी सफलता, सुलझ सकता है कोरोना हीटिंग का रहस्य, भारतीय वैज्ञानिकों ने सूर्य के बाहरी वायुमंडल यानी कोरोना में छिपी अशांति (टर्बुलेंस) का पता लगाने का एक नया तरीका खोजा है, जो दशकों पुराने उस रहस्य को समझने में मदद कर सकता है कि आखिर सूर्य का कोरोना उसकी सतह से कई गुना अधिक गर्म क्यों होता है। यह महत्वपूर्ण शोध आर्यभट्ट प्रेक्षण विज्ञान शोध संस्थान (एआरआईएस) Aryabhatta Research Institute of Observational Sciences (एआरआईएस), नैनीताल और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) Indian Institute of Technology दिल्ली के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। यह अध्ययन प्रतिष्ठित एस्ट्रोफिज़िकल जर्नल में The Astrophysical Journal में प्रकाशित हुआ है।

सूर्य का बाहरी वातावरण यानी कोरोना लाखों डिग्री सेल्सियस तक गर्म होता है, जबकि सूर्य की दृश्य सतह उससे कहीं कम गर्म होती है। वैज्ञानिक लंबे समय से यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर कोरोना इतनी अधिक गर्मी कैसे बनाए रखता है।
अब वैज्ञानिकों को इस दिशा में बड़ी सफलता मिली है। शोधकर्ताओं ने पाया कि सूर्य के कोरोना में मौजूद अनुप्रस्थ चुंबकीय जलगतिकीय (MHD) तरंगें — जिन्हें अल्फ़वेनिक या किंक तरंगें भी कहा जाता है — कोरोना में सूक्ष्म अशांति पैदा करती हैं। ये तरंगें चुंबकीय संरचनाओं के साथ आगे बढ़ती हैं, प्लाज्मा को अगल-बगल दोलन कराती हैं और समय के साथ छोटे पैमाने की अशांति विकसित करती हैं।

इस शोध का नेतृत्व एआरआईएस की पीएचडी छात्रा अंबिका सक्सेना और आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर वैभव पंत ने किया।वैज्ञानिकों ने उन्नत 3D MHD सिमुलेशन, फॉरवर्ड मॉडलिंग और कोरोना की Fe XIII 10749 Å स्पेक्ट्रल लाइन का उपयोग कर अध्ययन किया। सिमुलेशन में पाया गया कि कोरोना के चुंबकीय प्लूम में घनत्व समान नहीं होता,तरंगों के प्रसार के दौरान “फेज मिक्सिंग” होती है जिससे सूक्ष्म स्तर पर टर्बुलेंस विकसित होती है। इसके कारण प्लाज्मा अलग-अलग वेग से गति करता है और स्पेक्ट्रल लाइनों में लाल और नीले रंग की वैकल्पिक विषमताएं दिखाई देती हैं।

शोध में सामने आया कि वर्णक्रमीय विषमताएं रेखा तीव्रता के लगभग 20% तक पहुंच सकती हैं, द्वितीयक गति 30–40 किमी प्रति सेकंड तक हो सकती है और यह पैटर्न तरंगों के साथ बाहर की ओर बढ़ता है। यह संकेत देता है कि केवल अनुप्रस्थ MHD तरंगें ही कोरोना में जटिल गतिशीलता और अशांति उत्पन्न कर सकती हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि DKIST जैसी अत्याधुनिक वेधशालाओं से इस प्रक्रिया का प्रत्यक्ष अवलोकन जल्द संभव हो सकता है। यह खोज सौर कोरोना की ऊर्जा प्रणाली, स्पेस वेदर,सौर तूफानों और सूर्य की ऊष्मा संरचना को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह अध्ययन भारत की अंतरिक्ष और खगोल विज्ञान शोध क्षमता को वैश्विक स्तर पर मजबूत करता है। एआरआईएस और आईआईटी दिल्ली के वैज्ञानिकों की यह खोज भविष्य में सौर भौतिकी के क्षेत्र में नई दिशा दे सकती है।
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New scientific achievement for Indian astro physicists/scientists researchers