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Sarnath UNESCO World Heritage Site: सारनाथ बना भारत की 45वीं विश्व धरोहर, बुद्ध के प्रथम उपदेश की धरती को मिली वैश्विक पहचान

Sarnath UNESCO World Heritage Site: Sarnath becomes India's 45th World Heritage Site; the land of Buddha's first sermon gains global recognition.

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जहां बुद्ध ने दिया था पहला उपदेश, अब UNESCO की World Heritage List में शामिल हुआ सारनाथ

सुनीता अरुण

वाराणसी/नई दिल्ली: Sarnath UNESCO World Heritage Site: सारनाथ बना भारत की 45वीं विश्व धरोहर, बुद्ध के प्रथम उपदेश की धरती को मिली वैश्विक पहचान, उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित सारनाथ के प्राचीन बौद्ध स्थल को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कर लिया गया है। दक्षिण कोरिया के बुसान में आयोजित विश्व धरोहर समिति के 48वें सत्र में 25 जुलाई 2026 को यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया। इसके साथ ही भारत की UNESCO World Heritage properties की संख्या बढ़कर 45 हो गई है।

सारनाथ बौद्ध धर्म के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार, ज्ञान प्राप्ति के बाद भगवान बुद्ध ने यहीं अपना पहला उपदेश दिया था। यही वह स्थान माना जाता है जहां बुद्ध ने अपने प्रथम शिष्यों से मुलाकात की और उनकी शिक्षाओं के प्रसार की शुरुआत हुई। UNESCO ने भी सारनाथ को बुद्ध के जीवन से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थलों में शामिल किया है।

भारत की विश्व धरोहर सूची में एक और ऐतिहासिक अध्याय

सारनाथ को विश्व धरोहर का दर्जा मिलना भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि है। UNESCO के अनुसार, सारनाथ में 2,500 वर्षों से अधिक समय से बौद्ध तीर्थ और आध्यात्मिक प्रेरणा की परंपरा जुड़ी हुई है।

भारत सरकार के अनुसार, सारनाथ को UNESCO World Heritage List में शामिल किए जाने के बाद भारत के पास अब 45 विश्व धरोहर संपत्तियां हैं। भारत इस संख्या के आधार पर विश्व स्तर पर छठे और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में दूसरे स्थान पर है। भारत की UNESCO Tentative List में भी 69 स्थल शामिल हैं।

क्या है सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व?

सारनाथ उत्तर प्रदेश के वाराणसी में स्थित है और बौद्ध धर्म के चार प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यह स्थल भगवान बुद्ध के जीवन की उस महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा है जब उन्होंने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपना पहला उपदेश दिया।

UNESCO के अनुसार, वर्तमान विश्व धरोहर संपत्ति में चौखंडी स्तूप और सारनाथ के पुरातात्विक अवशेष शामिल हैं। पुरातात्विक परिसर में धमेक स्तूप, धर्मराजिका स्तूप, मूलगंधकुटी विहार, अशोक स्तंभ तथा अन्य महत्वपूर्ण अवशेष शामिल हैं। सारनाथ की ऐतिहासिक विरासत मौर्य काल से लेकर बाद की कई सदियों तक विकसित हुई। यहां मिले अवशेष भारत की प्राचीन बौद्ध स्थापत्य, कला और धार्मिक परंपराओं के विकास की कहानी बताते हैं।

UNESCO ने किन मानदंडों के तहत दी मान्यता?

सारनाथ को UNESCO World Heritage List में मानदंड (iii) और (vi) के तहत शामिल किया गया है। मानदंड (iii) के तहत सारनाथ के बौद्ध परंपरा में लंबे समय से चले आ रहे आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व को मान्यता दी गई है। वहीं मानदंड (vi) सारनाथ के भगवान बुद्ध के जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं से प्रत्यक्ष और मूर्त संबंध को दर्शाता है। इनमें बुद्ध का पहला उपदेश और ज्ञान प्राप्ति के बाद अपने प्रथम शिष्यों से मिलना प्रमुख है।

1998 से शुरू हुई थी विश्व धरोहर की यात्रा

सारनाथ को UNESCO की Tentative List में पहली बार 1998 में शामिल किया गया था। इसके बाद विश्व धरोहर का दर्जा हासिल करने के लिए लंबे समय तक नामांकन और मूल्यांकन की प्रक्रिया चली। भारत ने 2025-26 चक्र के लिए ‘Ancient Buddhist Site of Sarnath’ का आधिकारिक नामांकन प्रस्तुत किया था। UNESCO World Heritage Committee के 48वें सत्र में 25 जुलाई 2026 को इस नामांकन को मंजूरी मिली।

ASI की महत्वपूर्ण भूमिका

सारनाथ के संरक्षण और पुरातात्विक अध्ययन में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संस्कृति मंत्रालय के अनुसार, ASI ने 150 वर्षों से अधिक समय से सारनाथ में खुदाई और संरक्षण का कार्य किया है। सारनाथ की खुदाई से प्रसिद्ध मौर्यकालीन सिंह स्तंभ प्राप्त हुआ, जिसका सिंह शीर्षक बाद में भारत का राष्ट्रीय प्रतीक बना। सारनाथ से प्राप्त महत्वपूर्ण बौद्ध कला और पुरातात्विक सामग्री को संग्रहालय में संरक्षित किया गया है।

PM मोदी ने बताया गर्व का क्षण

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सारनाथ को UNESCO World Heritage List में शामिल किए जाने पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने इसे प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का क्षण बताया और कहा कि सारनाथ भगवान बुद्ध से गहराई से जुड़ा है तथा बुद्ध का ज्ञान, करुणा और सद्भाव का संदेश आज भी पूरी दुनिया को प्रेरित करता है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि UNESCO की यह मान्यता दुनिया भर के लोगों को सारनाथ आने और भगवान बुद्ध के आदर्शों से जुड़ने के लिए प्रेरित करेगी।

बौद्ध देशों के साथ सांस्कृतिक संबंधों को मिलेगा बढ़ावा

सारनाथ केवल भारत के लिए धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का स्थल नहीं है, बल्कि दुनिया भर के बौद्ध समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। भारत सरकार के अनुसार, UNESCO की यह मान्यता जापान, थाईलैंड, श्रीलंका, म्यांमार, कंबोडिया, वियतनाम, दक्षिण कोरिया और मंगोलिया जैसे देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक संबंधों और बौद्ध विरासत के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव को मजबूत करने में मदद करेगी।

चार प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थलों में तीन अब UNESCO सूची में

भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े चार प्रमुख बौद्ध तीर्थस्थलों में लुंबिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर का विशेष महत्व है। सारनाथ के UNESCO World Heritage List में शामिल होने के बाद इन प्रमुख स्थलों में से तीन—नेपाल का लुंबिनी, बिहार का महाबोधि मंदिर परिसर और उत्तर प्रदेश का सारनाथ—विश्व धरोहर सूची में शामिल हो चुके हैं।

भारत की UNESCO विरासत में लगातार विस्तार

भारत की UNESCO World Heritage सूची में पिछले वर्षों में लगातार नए स्थल जुड़ते रहे हैं। 2025 में Maratha Military Landscapes of India को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। अब 2026 में सारनाथ के जुड़ने के साथ भारत की कुल संख्या 45 हो गई है। भारत सरकार के अनुसार, देश की Tentative List में वर्तमान में 69 स्थल हैं, जो भविष्य में विश्व धरोहर सूची में शामिल किए जाने के लिए संभावित नामांकन का आधार हैं।

सारनाथ की UNESCO मान्यता क्यों महत्वपूर्ण है?

सारनाथ को UNESCO World Heritage का दर्जा मिलने का महत्व केवल एक नई सूचीबद्ध संपत्ति जुड़ने तक सीमित नहीं है। यह भारत की प्राचीन सभ्यता, बौद्ध दर्शन, स्थापत्य और सांस्कृतिक विरासत की वैश्विक पहचान को और मजबूत करता है। यह मान्यता सारनाथ के संरक्षण, सतत पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक सहयोग के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत सरकार ने सारनाथ के Outstanding Universal Value की रक्षा, पर्यटन के सतत प्रबंधन और बफर जोन में अनियोजित विकास को रोकने की प्रतिबद्धता जताई है।

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Author: Ib News

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