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नई दिल्ली/विदिशा: जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं 9 बच्चे, बेतवा नदी के स्टॉप डैम के खंभे फांदने को मजबूर; NHRC ने लिया स्वतः संज्ञान,

New Delhi/Vidisha: Nine children risk their lives to go to school, forced to clamber over the pillars of a stop dam on the Betwa River; NHRC takes suo motu cognizance.

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विदिशा के काकरौआ गांव में बच्चों की खतरनाक स्कूल यात्रा पर NHRC सख्त,

मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव से 2 सप्ताह में मांगी रिपोर्ट

अरुण कुमार

नई दिल्ली/विदिशा: जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं 9 बच्चे, बेतवा नदी के स्टॉप डैम के खंभे फांदने को मजबूर; NHRC ने लिया स्वतः संज्ञान, मध्य प्रदेश के विदिशा जिले से सामने आई एक चिंताजनक तस्वीर ने बच्चों की शिक्षा और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। काकरौआ गांव के स्कूली बच्चे स्कूल पहुंचने के लिए बेतवा नदी पर बने स्टॉप डैम के खुले खंभों को फांदकर जान जोखिम में डालने को मजबूर हैं। इस मामले का राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने स्वतः संज्ञान लिया है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, गांव के नौ विद्यार्थी रोजाना इसी खतरनाक रास्ते से नदी पार कर स्कूल जाते हैं, जिनमें पांच छात्राएं भी शामिल हैं। बच्चों के लिए यह रास्ता बेहद जोखिम भरा है, लेकिन सड़क मार्ग से स्कूल जाने पर दूरी काफी अधिक होने के कारण वे इस खतरनाक विकल्प को अपनाने के लिए मजबूर हैं।

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NHRC ने लिया स्वतः संज्ञान:
रिपोर्ट के मुताबिक, सड़क मार्ग से स्कूल जाने पर बच्चों को करीब 13 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है। इसके मुकाबले बेतवा नदी के स्टॉप डैम के खंभों को पार करके जाने पर यह दूरी घटकर लगभग 1.5 किलोमीटर रह जाती है। ग्रामीणों का कहना है कि परिवारों के लिए रोजाना बच्चों को इतनी दूर स्कूल छोड़ना संभव नहीं है, क्योंकि उन्हें खेतों में काम करना पड़ता है। ऐसे में बच्चों के सामने या तो स्कूल छोड़ने या फिर जान जोखिम में डालकर इस रास्ते से जाने का विकल्प रह जाता है।
4 अगस्त 2026 की मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, स्टॉप डैम के खुले खंभों को फांदकर स्कूल जाते बच्चों का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो सामने आने के बाद मामले ने व्यापक ध्यान आकर्षित किया। बताया गया है कि बच्चे नदी पार करने के दौरान एक-एक करके स्टॉप डैम के खंभों को पार करते हैं। इस दौरान जरा सी चूक गंभीर दुर्घटना का कारण बन सकती है।
मामले की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक छात्रा अपनी कम लंबाई के कारण स्टॉप डैम के खंभों को पार नहीं कर पाई। इसके चलते वह स्कूल नहीं जा सकी और कथित तौर पर फाइनल परीक्षा में फेल हो गई। यह घटना सिर्फ बच्चों की सुरक्षा का सवाल नहीं उठाती, बल्कि यह भी बताती है कि सुरक्षित आवागमन की सुविधा के अभाव में बच्चों की शिक्षा सीधे प्रभावित हो रही है।
मीडिया रिपोर्टों का स्वतः संज्ञान लेते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कहा है कि यदि रिपोर्ट में बताए गए तथ्य सही हैं तो यह मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है। आयोग ने मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। NHRC ने बच्चों के शिक्षा के अधिकार और उनके सुरक्षित स्कूल आवागमन को इस मामले से जोड़ते हुए राज्य सरकार से आवश्यक कदमों की जानकारी मांगी है।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21A का उल्लेख किया है। अनुच्छेद 21A के तहत 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए राज्य द्वारा निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान है। इसके अलावा बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 (RTE Act) भी 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को शिक्षा का अधिकार प्रदान करता है। आयोग का कहना है कि शिक्षा का अधिकार केवल स्कूल में प्रवेश तक सीमित नहीं है। बच्चों को सुरक्षित वातावरण और सुरक्षित बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराना भी इस अधिकार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
NHRC ने अविनाश मेहरोत्रा बनाम भारत संघ (2009) मामले का भी उल्लेख किया है। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सुरक्षित विद्यालय और सुरक्षित बुनियादी ढांचे के महत्व को रेखांकित किया था। इसी आधार पर आयोग ने माना कि यदि बच्चों के स्कूल पहुंचने के लिए सुरक्षित परिवहन या रास्ते की व्यवस्था नहीं है और उन्हें जान जोखिम में डालनी पड़ रही है, तो यह उनके गरिमापूर्ण शिक्षा के अधिकार से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
रिपोर्टों के अनुसार मामले की जानकारी सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी ने संबंधित स्थान का दौरा किया और पूरे मामले से जिला कलेक्टर को अवगत कराया। हालांकि, अभी तक नदी पार करने के लिए सुरक्षित रास्ता या वैकल्पिक मार्ग तैयार किए जाने की कोई स्पष्ट समयसीमा सामने नहीं आई है।
ग्रामीणों के मुताबिक उनके सामने बड़ी व्यावहारिक समस्या है। परिवारों के सदस्य खेतों में काम करते हैं और बच्चों को रोजाना करीब 13 किलोमीटर दूर स्कूल तक छोड़ने या लाने में सक्षम नहीं हैं। ऐसे में ग्रामीणों का कहना है कि उनके सामने दो ही विकल्प बचते हैं—या तो बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दें या बच्चे इसी जोखिम भरे रास्ते से स्कूल जाते रहें।
विदिशा का यह मामला ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूली बच्चों के लिए सुरक्षित परिवहन और बुनियादी ढांचे की उपलब्धता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। शिक्षा का अधिकार तभी प्रभावी हो सकता है जब बच्चे सुरक्षित तरीके से स्कूल तक पहुंच भी सकें। अब निगाहें मध्य प्रदेश सरकार की रिपोर्ट और उस पर NHRC की आगे की कार्रवाई पर हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि इन नौ बच्चों को कब तक जान जोखिम में डालकर स्कूल जाना पड़ेगा और सुरक्षित मार्ग कब उपलब्ध कराया जाएगा।

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Ib News
Author: Ib News

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