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लोकतंत्र की असली ताकत: जागरूक नागरिक, स्वस्थ लोकमत और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का ‘लोकमत परिष्कार’

The True Strength of Democracy: Informed Citizens, Healthy Public Opinion, and Pandit Deendayal Upadhyaya’s Concept of ‘Refinement of Public Opinion’

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चन्दन कुमार

नई दिल्ली (विचार लेख)

लोकतंत्र की असली ताकत: जागरूक नागरिक, स्वस्थ लोकमत और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का ‘लोकमत परिष्कार’ लोकतंत्र को हम अक्सर चुनाव, मतदान और सरकार बनाने की प्रक्रिया तक सीमित कर देते हैं। लेकिन मेरे विचार से लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल संसद या चुनावी व्यवस्था में नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक और स्वस्थ लोकमत में निहित होती है। इसी संदर्भ में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का “लोकमत परिष्कार” का विचार आज भी विशेष प्रासंगिक दिखाई देता है।


दीनदयाल जी के लिए राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं थी। वे राजनीति को समाज और राष्ट्र की सेवा से जोड़कर देखते थे। उनका मानना था कि लोकतंत्र तभी सार्थक हो सकता है, जब जनता केवल मतदाता न रहे, बल्कि अपने मत के महत्व और अपनी जिम्मेदारी को भी समझे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के चिंतन में लोकमत परिष्कार का अर्थ केवल जनता की राय को अपने पक्ष में करना नहीं था, बल्कि समाज में ऐसी सकारात्मक, राष्ट्रहितकारी और नैतिक जनचेतना का निर्माण करना था, जिसमें नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों को भी समझें। उनके विचार में लोकतंत्र केवल चुनाव और सत्ता परिवर्तन की व्यवस्था नहीं है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जागरूक नागरिक, स्वस्थ सामाजिक वातावरण और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना में निहित है। इसलिए आवश्यक है कि समाज में विचारों का स्वस्थ संवाद हो, जनमत तथ्यों और मूल्यों पर आधारित हो तथा राजनीति का उद्देश्य समाज और राष्ट्र की सेवा बने। दीनदयाल जी का एकात्म मानववाद भी इसी व्यापक दृष्टिकोण से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। वे व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और मानवता को एक-दूसरे से जुड़े हुए मानते थे। इसलिए लोकमत का परिष्कार भी केवल राजनीतिक विषय नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दायित्व है। उनके चिंतन में अंत्योदय अर्थात समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास और कल्याण का लाभ पहुँचाने का विचार प्रमुख था।

लोकमत की गुणवत्ता का परीक्षण इस बात से भी किया जा सकता है कि सार्वजनिक विमर्श में समाज के कमजोर वर्गों की आवाज कितनी जगह पाती है। यदि लोकतांत्रिक चर्चा केवल प्रभावशाली वर्गों, बड़े शहरों या शक्तिशाली समूहों की समस्याओं तक सीमित हो जाए, तो लोकमत का स्वरूप अधूरा रह सकता है। इसलिए लोकमत परिष्कार का एक महत्वपूर्ण आयाम यह भी हो सकता है कि समाज के अंतिम व्यक्ति की समस्याएँ सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बनें। इस संदर्भ में दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद और अंत्योदय के विचार लोकमत को केवल चुनावी गणित से आगे ले जाकर सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ते हैं।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने लोकतंत्र के इसी व्यापक पक्ष पर विचार करते हुए “लोकमत परिष्कार” की अवधारणा को महत्व दिया। उनके लिए लोकमत का निर्माण केवल सरकार या राजनीतिक दलों का कार्य नहीं था। वे समाज में ऐसे स्वतंत्र, निस्वार्थ और नैतिक विचार-नेतृत्व की आवश्यकता पर बल देते थे, जो जनता के बीच विचार, विवेक, कर्तव्य और सामाजिक मर्यादा की चेतना विकसित करे। उनके लोकतंत्र संबंधी विचारों में चुनाव और मताधिकार महत्वपूर्ण थे, लेकिन वे इन्हें लोकतंत्र का अंतिम लक्ष्य नहीं मानते थे।
दीनदयाल उपाध्याय के समय में जनमत निर्माण के प्रमुख साधन समाचारपत्र, पत्रिकाएँ, सभाएँ और प्रत्यक्ष संवाद थे। आज सोशल मीडिया और डिजिटल संचार ने इस प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। आज कोई भी व्यक्ति सूचना प्राप्त करने के साथ-साथ उसे आगे प्रसारित भी कर सकता है। किसी घटना का वीडियो, कोई बयान या कोई दावा कुछ ही समय में व्यापक जनसमूह तक पहुँच सकता है। इसके साथ गलत सूचना, अधूरी जानकारी और संदर्भ से काटकर प्रस्तुत की गई सामग्री की चुनौती भी सामने आती है। आज जब लोकतांत्रिक समाज में सूचना के साधन अत्यंत व्यापक हो चुके हैं और नागरिकों के सामने विचारों तथा सूचनाओं की बहुत बड़ी मात्रा उपलब्ध है, तब “लोकमत परिष्कार” की अवधारणा को समझना और भी उपयोगी हो जाता है। इसका अर्थ किसी विशेष दल या विचार के पक्ष में जनता को प्रभावित करना नहीं, बल्कि नागरिकों को तथ्य, विवेक, संवाद और सार्वजनिक उत्तरदायित्व के आधार पर विचार करने में सक्षम बनाना है।

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Ib News
Author: Ib News

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