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बेंगलुरु: “विश्व को पूर्णता प्रदान करना हमारा कार्य है” — प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी

Bengaluru: “It is our task to bring completeness to the world” — Hon. Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat

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भारतीय शिक्षण मण्डल की अखिल भारतीय प्रान्त टोली बैठक का प्रेरणादायी समापन, नवीन वेबसाइट का लोकार्पण एवं ‘विविभा’ पुस्तक का विमोचन

डॉ दीपक शर्मा

बेंगलुरु: “विश्व को पूर्णता प्रदान करना हमारा कार्य है” — प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, भारतीय शिक्षण मण्डल की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रान्त टोली बैठक का आज आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर, बेंगलुरु में सफलतापूर्वक समापन हुआ। बैठक में देश के 43 प्रान्तों से आए लगभग 380 प्रतिनिधियों—कुलपति, शिक्षाविद्, शोधकर्ता, नीति-निर्माता, शिक्षक एवं कार्यकर्ताओं—ने सहभागिता की। समापन सत्र के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूजनीय सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी रहे।

इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. मनमोहन वैद्य जी, भारतीय शिक्षण मण्डल के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. सच्चिदानन्द जोशी जी, अखिल भारतीय महामंत्री डॉ. भरत शरण भूषण जी, अखिल भारतीय संगठन मंत्री श्री बी.आर. शंकरानन्द जी सहित अखिल भारतीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं देशभर से आए प्रान्त प्रतिनिधि उपस्थित रहे। बैठक का वृत्त तथा तीन दिवसीय चिंतन-मंथन के प्रमुख निष्कर्ष भारतीय शिक्षण मण्डल के अखिल भारतीय सह संगठन मंत्री श्री सुनील शर्मा जी ने प्रस्तुत किए।

“विश्व को सही बोध देने वाली शिक्षा का निर्माण करें”

अपने मार्गदर्शन में प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि आज विश्व अनेक संकटों और जटिल प्रश्नों से जूझ रहा है। वर्तमान वैश्विक विचारधाराएँ और व्यवस्थाएँ जीवन को आंशिक रूप से देखती हैं, जबकि भारत की दृष्टि जीवन, समाज, प्रकृति और समस्त सृष्टि को एकात्म रूप में समझती है। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान परम्परा का उद्देश्य किसी पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि धर्म, संतुलन और समस्त मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना है।

उन्होंने कहा, “विश्व को पूर्णता प्रदान करना हमारा कार्य है। हमारी समग्र दृष्टि के आधार पर समस्त प्राणिमात्र के कल्याण के लिए भारत की वाणी को विश्व को सुनना ही होगा। यह समय की आवश्यकता भी है और अनिवार्यता भी है।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय दृष्टि अन्य विचारों को अस्वीकार नहीं करती, बल्कि प्रत्येक समाज के अनुभवजन्य सत्य का सम्मान करती है। भारतीय चिंतन की ‘अनेकता’ की अवधारणा सभी दृष्टिकोणों का आदर करते हुए शास्त्रार्थ और संवाद के माध्यम से सत्य के व्यापक स्वरूप को समझने का मार्ग प्रदान करती है।

“भारतीय शिक्षण मण्डल एक व्यापक सभ्यतागत दायित्व का वाहक”

डॉ. भागवत जी ने कहा कि भारतीय शिक्षण मण्डल का कार्य कोई सीमित संगठनात्मक गतिविधि नहीं, बल्कि भारत के व्यापक सभ्यतागत दायित्व का एक महत्वपूर्ण अंग है। यह कार्य ऐसी शिक्षा व्यवस्था के निर्माण का प्रयास है जो मनुष्य के समग्र विकास को केंद्र में रखती है तथा केवल आजीविका या आर्थिक सफलता तक सीमित नहीं रहती।

उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षण मण्डल सदैव राजनीतिक दलों और उनकी सीमाओं से स्वतंत्र रहकर कार्य करता है। समाज और शिक्षा के क्षेत्र में दीर्घकालिक परिवर्तन के लिए वैचारिक स्वतंत्रता और मूल्यों पर आधारित दृष्टि आवश्यक है।

बेंगलुरु में भारतीय शिक्षण मण्डल की अखिल भारतीय प्रान्त टोली बैठक के समापन पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भारतीय ज्ञान परंपरा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रोन्मुख शिक्षा व्यवस्था पर महत्वपूर्ण विचार रखे। इस दौरान नई वेबसाइट और ‘विविभा’ पुस्तक का विमोचन भी हुआ।

“निरंतरता, एकाग्रता और दूरदृष्टि से ही होगा परिवर्तन”

राष्ट्र निर्माण में शिक्षा की भूमिका पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी कार्यकर्ता का सबसे महत्वपूर्ण गुण एकाग्रता और निरंतरता है। परिवर्तन केवल घोषणाओं और आयोजनों से नहीं आता, बल्कि सतत साधना, अनुशासित प्रयास और दीर्घकालिक प्रतिबद्धता से आता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में उन्होंने शिक्षाविदों से आह्वान किया कि वे केवल नीति के क्रियान्वयन तक सीमित न रहें, बल्कि यह भी विचार करें कि शिक्षा के माध्यम से किस प्रकार का भारत निर्मित करना है। उन्होंने कहा कि दृष्टि के बिना कार्य अंधा होता है और कार्य के बिना दृष्टि निष्प्राण। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने भारत को एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान किया है, जिसे भारतीय अनुभव, भारतीय चिंतन और भारतीय शिक्षा मॉडल के आधार पर सार्थक बनाया जाना चाहिए।

“कौशल और संस्कार का समन्वय ही भारतीय शिक्षा का आदर्श”

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कौशल-आधारित शिक्षा की आवश्यकता है ताकि युवा रोजगार योग्य, उद्यमी और आत्मनिर्भर बन सकें। किन्तु संस्कारों से रहित कौशल समाज में असंतुलन उत्पन्न कर सकता है। भारतीय शिक्षा का उद्देश्य ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना है जिसमें कुशल हाथ, चिंतनशील मस्तिष्क और संवेदनशील हृदय का समन्वय हो।

“भारत को विश्व का अनुकरण नहीं, मार्गदर्शन करना है”

भारत की सभ्यतागत चेतना का उल्लेख करते हुए डॉ. भागवत जी ने कहा कि भारत की श्रेष्ठता किसी अहंकार पर नहीं, बल्कि उसके अनुभव, जीवन-दृष्टि और धर्मनिष्ठ परम्परा पर आधारित है। आज जब विश्व टिकाऊ जीवन पद्धति, संतुलित विकास और मानवीय मूल्यों की खोज में है, तब भारतीय ज्ञान परम्पराएँ उसके अनेक प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत कर सकती हैं।

उन्होंने कहा, “हम आधुनिकता का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि उसे भारतीयता में प्रतिष्ठित कर रहे हैं। हमारा उद्देश्य ऐसी पीढ़ी तैयार करना है, जो वैश्विक स्तर पर सक्षम होने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों, भारतीय मूल्यों तथा राष्ट्र और मानवता के प्रति उत्तरदायित्व से भी जुड़ी रहे।”

नवीन वेबसाइट का लोकार्पण एवं ‘विविभा’ पुस्तक का विमोचन

समापन सत्र में प.पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने अपने करकमलों से भारतीय शिक्षण मण्डल की नवीन आधिकारिक वेबसाइट का लोकार्पण किया। वेबसाइट लोकार्पण की प्रक्रिया का संचालन भारतीय शिक्षण मण्डल के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. संजय पाठक जी ने किया। इस अवसर पर ‘विविभा’ से संबंधित पुस्तक का विमोचन भी संपन्न हुआ।

यह नवीन वेबसाइट भारतीय शिक्षण मण्डल की गतिविधियों, विचारों, शोध एवं भारतीय शिक्षा की दृष्टि को देश-विदेश के शिक्षकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों एवं समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

बैठक का समापन भारतीय ज्ञान परम्परा आधारित, समग्र, मूल्यनिष्ठ एवं राष्ट्रोन्मुख शिक्षा व्यवस्था के निर्माण के संकल्प के साथ हुआ। भारतीय शिक्षण मण्डल ने देशभर के शिक्षकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं एवं शिक्षा संस्थानों से इस राष्ट्रीय शैक्षिक पुनर्जागरण अभियान में सक्रिय सहभागिता का आह्वान किया।

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Author: Ib News

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