नई दिल्ली | विशेष रिपोर्ट
Swachhata hi Seva 2026: महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय ने बदली स्वच्छता की तस्वीर, एक स्वच्छ शहर की पहचान सिर्फ साफ सड़कों और खुले नालों से नहीं होती, बल्कि इस बात से भी होती है कि उसके नागरिक स्वच्छता व्यवस्था में कितनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। स्वच्छता ही सेवा 2026 ने इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए महिलाओं, स्वयं सहायता समूहों और ट्रांसजेंडर समुदाय की भागीदारी को स्वच्छता अभियान के केंद्र में रखा है।
‘स्वच्छता में सहभाग, स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ की थीम के साथ 17 सितंबर 2026 से शुरू हुए इस अभियान में देश के अलग-अलग हिस्सों से ऐसी प्रेरक कहानियां सामने आ रही हैं, जहां कचरा केवल समस्या नहीं बल्कि रोजगार, उद्यमिता, सम्मान और सामाजिक भागीदारी का माध्यम बन रहा है। उत्तर प्रदेश के लोनी से लेकर पटना, भोपाल, उत्तराखंड, शिलांग और ओडिशा तक महिलाओं और ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों ने यह साबित किया है कि स्वच्छता केवल सरकारी जिम्मेदारी नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों की भागीदारी से स्वच्छता अभियान को आजीविका और सामाजिक सशक्तिकरण से भी जोड़ा जा सकता है।

लोनी में गोबर से अगरबत्ती और लोबान कप, 40-50 महिलाओं को रोजगार
उत्तर प्रदेश के लोनी की कृष्णा विहार कॉलोनी में महिलाओं के एक समूह ने कचरा प्रबंधन की चुनौती को रोजगार के अवसर में बदलने की पहल की है। गौशालाओं और डेयरियों के आसपास जमा होने वाला गाय का गोबर कई बार नालियों और सीवेज चैनलों को जाम करने की समस्या पैदा करता है। महिलाओं ने इसी गोबर का उपयोग कर अगरबत्ती और लोबान कप तैयार करने का काम शुरू किया।
शुरुआत में इस काम से करीब 8-10 महिलाएं जुड़ी थीं, लेकिन धीरे-धीरे यह पहल बढ़ती गई। लोनी नगर पालिका परिषद की एक महिला अधिकारी ने भी इस पहल की संभावनाओं को समझते हुए महिलाओं को गौशाला मालिकों से जोड़ने और गोबर की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद की। गर्मियों के दौरान अगरबत्ती का उत्पादन बढ़ने पर इस पहल से करीब 40-50 महिलाओं को रोजगार मिलने की बात सामने आई है। यह पहल महिलाओं के लिए आय का साधन बनने के साथ-साथ कचरे के पुन: उपयोग का उदाहरण भी बनी है।

गोबर से कम हुआ लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल
अगरबत्ती निर्माण में सामान्य तौर पर लकड़ी के बुरादे का इस्तेमाल किया जाता है। इस पहल में लगभग 30-35 प्रतिशत सूखे गोबर के पाउडर का इस्तेमाल कर लकड़ी के बुरादे की आवश्यकता को कम किया जाता है। इससे एक तरफ गोबर के उपयोग का रास्ता बनता है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार करने की संभावना बढ़ती है।
इन उत्पादों की आपूर्ति दिल्ली, मुंबई, पंजाब, गुजरात और हैदराबाद सहित कई क्षेत्रों में होने की जानकारी दी गई है। कोविड काल के दौरान बड़े ब्रांड्स के लिए भी उत्पादन किया गया और कुछ ऑर्डर मॉरिशस तथा दक्षिण अफ्रीका तक पहुंचने की बात सामने आई है। नगर पालिका परिषद को भी इन उत्पादों की बिक्री से 25 प्रतिशत तक आय मिलने की जानकारी दी गई है।
गोबर से ईंधन और फूलों के गमले बनाने की तैयारी
लोनी की यह पहल केवल अगरबत्ती तक सीमित नहीं है। भविष्य में गोबर से जलने वाली लकड़ी तैयार करने की योजना पर भी काम किया जा रहा है। इसका इस्तेमाल श्मशान घाटों, हवन और अन्य आवश्यक कार्यों में किया जा सकता है। इसके अलावा गोबर से फूलों के गमले बनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है। इस्तेमाल के बाद इन गमलों के खाद में बदलकर मिट्टी में मिल जाने की संभावना उन्हें सर्कुलर इकोनॉमी की अवधारणा से जोड़ती है।
पटना का पिंक MRF: महिलाओं ने संभाली कचरा प्रबंधन की कमान
बिहार की राजधानी पटना में भी महिलाओं की भागीदारी ने स्वच्छता व्यवस्था को नया आयाम दिया है। शहर की पिंक मटीरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) में मुख्य भूमिका महिलाओं की है। महिला सुपरवाइजर के नेतृत्व में संचालित यह सुविधा सूखे और गीले कचरे के प्रबंधन में काम करती है। पिंक MRF की क्षमता प्रतिदिन लगभग 2 टन सूखा कचरा, 1.5 टन गीला कचरा प्रबंधित करने की बताई गई है। यह सुविधा महिलाओं के लिए वेस्ट मैनेजमेंट सेक्टर में रोजगार और नेतृत्व के अवसर पैदा करने के उद्देश्य से विकसित की गई। पटना नगर निगम ने इस पहल का समर्थन किया और पिंक MRF को लगभग तीन महीने में तैयार किया गया।
‘कैश फॉर वेस्ट’ से नागरिकों को मिल रहा प्रोत्साहन
पिंक MRF से जुड़ी ‘कैश फॉर वेस्ट’ पहल में नागरिक अपना सूखा कचरा केंद्र पर लाकर निर्धारित दरों के अनुसार भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। इस मॉडल में कचरा नागरिक के लिए आर्थिक मूल्य रखता है और शहर को कचरा प्रबंधन में अतिरिक्त सहयोग मिलता है। यानी कचरे का मूल्य → नागरिकों की भागीदारी → बेहतर कचरा संग्रहण → स्वच्छ शहर का एक मॉडल तैयार होता है।

कबाड़ वाहन बना मोबाइल पिंक टॉयलेट
पटना की स्वच्छता पहल का एक और दिलचस्प उदाहरण पुराने और बेकार वाहनों का पुन: उपयोग है। पुरानी गाड़ियों को मोबाइल पिंक टॉयलेट में परिवर्तित किया गया। इससे कबाड़ हो चुकी वस्तु को दोबारा उपयोग में लाकर स्वच्छता सुविधा में बदला गया। यह पहल 3R—Reduce, Reuse और Recycle की अवधारणा को जमीन पर लागू करने का उदाहरण है।
भोपाल में 250 महिला ब्रांड एंबेसडर की भूमिका
मध्य प्रदेश के भोपाल में करीब 250 महिला ब्रांड एंबेसडर नगर निगम के साथ मिलकर स्वच्छता और कचरा प्रबंधन के क्षेत्र में काम कर रही हैं। इन महिलाओं ने सिंगल-यूज प्लास्टिक के इस्तेमाल को कम करने के उद्देश्य से 25 वार्डों में ‘बर्तन बैंक’ शुरू किए हैं। सामुदायिक कार्यक्रमों और आयोजनों में डिस्पोजेबल सामान की जगह पुन: इस्तेमाल किए जा सकने वाले बर्तनों का उपयोग कराया जाता है। इससे आयोजनों के दौरान पैदा होने वाले कचरे को कम करने में मदद मिलती है।
हर महीने ₹100 का योगदान, सामूहिक स्वच्छता फंड
भोपाल में 60 सदस्यों वाले ‘स्वच्छता किटी ग्रुप’ ने सामुदायिक स्वच्छता के लिए आर्थिक भागीदारी का मॉडल तैयार किया है। समूह की प्रत्येक महिला हर महीने ₹100 का योगदान देती है। इससे एक साझा फंड तैयार होता है, जिसका इस्तेमाल सामुदायिक सफाई गतिविधियों में किया जाता है। यह मॉडल दिखाता है कि छोटे-छोटे व्यक्तिगत योगदान मिलकर सामूहिक स्वच्छता अभियान को मजबूत बना सकते हैं।
उत्तराखंड की ‘बैनी सेना’ में 570 महिलाएं
उत्तराखंड में महिलाओं की भागीदारी को ‘बैनी सेना’ यानी बहनों की सेना के रूप में संगठित किया गया है। यहां 57 समूहों से जुड़ी करीब 570 महिलाएं अपने-अपने वार्डों में स्वच्छता गतिविधियों की निगरानी करती हैं। इनकी जिम्मेदारियों में-
- नागरिकों से संवाद
- स्वच्छता संबंधी जागरूकता
- शिकायतों को संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना
- नगर प्रशासन और सफाई कर्मचारियों के बीच समन्वय
- स्थानीय स्वच्छता गतिविधियों की निगरानी शामिल हैं। इस तरह महिलाएं स्वच्छता व्यवस्था में केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर की सक्रिय भागीदार बन रही हैं।
शिलांग में महिलाओं ने कचरे से बनाई आजीविका
मेघालय के शिलांग में इन्नेहस्खेम सेल्फ-हेल्प ग्रुप से जुड़ी महिलाएं घरों से गीला कचरा एकत्र करती हैं और बायोडिग्रेडेबल कचरे को खाद में बदलती हैं। इनमें कई महिलाएं पहले कचरा बीनने का काम करती थीं। प्रशिक्षण और पुनर्वास की पहल के बाद उन्होंने खाद निर्माण को आजीविका के रूप में अपनाया। उनकी सामूहिक एकजुटता के कारण उन्हें ‘मेरी मेडन्स ऑफ मार्टन’ नाम से भी जाना जाता है। यह उदाहरण बताता है कि उचित प्रशिक्षण और अवसर मिलने पर कचरा प्रबंधन से जुड़े काम को सम्मानजनक और टिकाऊ आजीविका में बदला जा सकता है।
ओडिशा में ट्रांसजेंडर समुदाय ने संभाली स्वच्छता व्यवस्था
स्वच्छता ही सेवा 2026 की सबसे महत्वपूर्ण कहानियों में से एक ओडिशा से सामने आती है, जहां ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों को शहरी स्वच्छता व्यवस्था में पेशेवर भूमिकाएं दी गई हैं। कटक में नगर निगम ने ट्रांसजेंडर लोगों को एक स्वयं सहायता समूह में संगठित किया और उन्हें प्रशिक्षण देकर सेप्टेज ट्रीटमेंट प्लांट के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी सौंपी। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे ऐसे समुदाय को औपचारिक रोजगार और तकनीकी जिम्मेदारी का अवसर मिला, जिसे लंबे समय तक सामाजिक और आर्थिक अवसरों से दूर रखा गया।
भुवनेश्वर में 75 KLD FSTP की जिम्मेदारी
भुवनेश्वर में स्वयं सहायता समूह स्वीकृति को बसुआघाई स्थित 75 KLD फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट (FSTP) के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी दी गई। समूह के सदस्यों को तकनीकी और प्रबंधन संबंधी प्रशिक्षण देने के बाद यह जिम्मेदारी सौंपी गई। समूह की अध्यक्ष मेघना साहू के अनुसार, इस तरह के काम ने सदस्यों को अपनी पहचान को लेकर आत्मविश्वास और पेशेवर क्षेत्र में भागीदारी का अवसर दिया है। अब वे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के छात्रों तथा अन्य आगंतुकों को अपने काम के बारे में जानकारी देने में भी सक्षम हैं।
सेप्टिक टैंक सफाई में भी ट्रांसजेंडर समूहों की भागीदारी
भुवनेश्वर नगर निगम ने सात सेसपूल वाहनों के संचालन और रखरखाव में भी ट्रांसजेंडर समूहों को शामिल किया है। इस कार्य में शामिल ड्राइवरों और हेल्पर्स को कम से कम लागू मजदूरी के अनुसार रोजगार देने की व्यवस्था के साथ स्वास्थ्य, स्वच्छता, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण और स्लज हटाने की तकनीक संबंधी प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। यह पहल स्वच्छता व्यवस्था में सामाजिक समावेशन और रोजगार के नए अवसरों का उदाहरण बन रही है।
स्वच्छता से आगे बढ़कर सम्मान और रोजगार की कहानी
स्वच्छता ही सेवा 2026 से सामने आने वाली ये कहानियां बताती हैं कि स्वच्छता केवल कचरा हटाने या शहर को साफ रखने का अभियान नहीं है। जब महिलाओं को कचरा प्रबंधन में रोजगार मिलता है, तो स्वच्छता के साथ आर्थिक सशक्तिकरण जुड़ता है। जब स्वयं सहायता समूह स्थानीय स्वच्छता गतिविधियों की जिम्मेदारी लेते हैं, तो सामुदायिक भागीदारी मजबूत होती है। और जब ट्रांसजेंडर समुदाय को तकनीकी एवं पेशेवर जिम्मेदारियां मिलती हैं, तो स्वच्छता अभियान सामाजिक समावेशन और सम्मान का माध्यम बन जाता है।
स्वच्छता ही सेवा 2026 का बड़ा संदेश
17 सितंबर 2026 से शुरू हुआ स्वच्छता ही सेवा 2026 अभियान ‘स्वच्छता में सहभाग, स्वच्छ भारत, विकसित भारत’ की भावना को आगे बढ़ा रहा है। लोनी की महिलाओं द्वारा गोबर से उत्पाद बनाने से लेकर पटना के पिंक MRF, भोपाल के बर्तन बैंक, उत्तराखंड की बैनी सेना, शिलांग की महिला समूहों और ओडिशा के ट्रांसजेंडर स्वच्छता कर्मियों तक—इन सभी उदाहरणों में एक साझा संदेश दिखाई देता है:
स्वच्छता तब सबसे प्रभावी होती है, जब समाज का हर वर्ग उसमें भागीदार बने।
स्वच्छ भारत का लक्ष्य केवल साफ सड़कें और कचरा-मुक्त शहर नहीं है। इसका व्यापक अर्थ सम्मानजनक रोजगार, सामाजिक भागीदारी, पर्यावरण संरक्षण, उद्यमिता और समावेशी विकास से भी जुड़ा है। इन पहलों ने यह दिखाया है कि जिस वस्तु को हम कचरा समझते हैं, उसमें भी आर्थिक और पर्यावरणीय मूल्य हो सकता है और जिन लोगों को समाज अक्सर हाशिए पर रखता है, वे भी स्वच्छ और विकसित भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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