अरुण कुमार
नई दिल्ली
Jantar Mantar Case: 3 महिला पत्रकारों के यौन उत्पीड़न पर NHRC सख्त, दिल्ली पुलिस को नोटिस, नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर 3 अक्टूबर 2026 को हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान तीन महिला पत्रकारों के साथ दिल्ली पुलिस कर्मियों द्वारा कथित यौन उत्पीड़न के मामले ने अब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का ध्यान खींचा है। NHRC ने मीडिया रिपोर्ट का स्वतः संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस आयुक्त को नोटिस जारी किया है और मामले में दो सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
आयोग ने कहा है कि यदि मीडिया रिपोर्ट में सामने आए आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला हो सकता है। मामला उस विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है जिसमें प्रदर्शनकारी और विभिन्न संगठन मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया था।

NHRC ने क्यों लिया स्वतः संज्ञान?
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 8 अक्टूबर को इस मामले को अपनी स्वतः संज्ञान वाली कार्रवाई में शामिल किया। आयोग के अनुसार मीडिया में तीन पत्रकारों द्वारा दिल्ली पुलिस कर्मियों पर कथित यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए जाने की खबर सामने आई थी। NHRC ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इसका मतलब यह है कि आयोग ने अभी आरोपों को सत्यापित तथ्य के रूप में स्वीकार नहीं किया है, बल्कि संबंधित घटनाओं की जांच और पुलिस की कार्रवाई पर रिपोर्ट मांगी है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शिकायत करने वाली महिलाएं कौन थीं। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक तीन शिकायतें पुलिस के पास पहुंचीं। हालांकि, तीनों महिलाओं के पूरे नाम आधिकारिक रूप से सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। इसलिए सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले नामों को आधिकारिक पहचान मानना उचित नहीं होगा।
एक स्वतंत्र पत्रकार की शिकायत इस मामले में सबसे ज्यादा चर्चा में रही। रिपोर्टों के अनुसार वह डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म से जुड़ी स्वतंत्र पत्रकार हैं। शिकायत के मुताबिक वह 3 अक्टूबर को जंतर-मंतर के आसपास प्रदर्शन की कवरेज कर रही थीं। इसी दौरान उन्होंने AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा को पुलिस द्वारा हिरासत में लिए जाते हुए देखा।

महिला पत्रकार का आरोप है कि जिस समय नेहा बोरा को हिरासत में लिया जा रहा था, वहां महिला पुलिसकर्मी मौजूद नहीं थीं। उन्होंने इस बारे में पुलिस से सवाल किया। शिकायत में आरोप लगाया गया कि इसी दौरान ACP विवेक भगत ने उनके साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार किया, उन्हे छुआ और धक्का दिया। महिला पत्रकार ने कथित घटना के बाद पुलिस अधिकारी से जवाब मांगा और बाद में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए संसद मार्ग पुलिस थाने पहुंचीं। यह पूरा आरोप अभी जांचाधीन है और स्वतंत्र रूप से सिद्ध नहीं हुआ है।
दूसरी शिकायतकर्ता भी स्वतंत्र पत्रकार बताई गई हैं। उनकी शिकायत के अनुसार वह अशोक रोड पर प्रदर्शन की कवरेज कर रही थीं। उस समय वह पूर्व कार्यकर्ता/नेता योगेंद्र यादव और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण की हिरासत की वीडियो रिकॉर्डिंग कर रही थीं। शिकायत के मुताबिक इसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि किसी ने उनकी पीठ को छुआ। जब उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो एक पुलिस अधिकारी उनके बहुत करीब खड़ा था। महिला पत्रकार ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारी से इस बारे में सवाल किया, लेकिन उनके अनुसार अधिकारी ने आरोप को गंभीरता से नहीं लिया। यह शिकायत भी दिल्ली पुलिस को दी गई तीन शिकायतों में शामिल है और क्राइम ब्रांच को जांच के लिए भेजी गई।

तीसरी शिकायत को लेकर उपलब्ध रिपोर्टों में कुछ अंतर दिखाई देता है। कुछ रिपोर्टें तीनों शिकायतकर्ताओं को महिला पत्रकार बताती हैं, जबकि शिकायतों की समीक्षा पर आधारित रिपोर्ट में तीसरी शिकायतकर्ता को CJP से जुड़ी एक महिला प्रदर्शनकारी/गृहिणी बताया गया है। उस महिला ने आरोप लगाया कि 3 अक्टूबर को अशोक रोड पर पुलिस द्वारा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने के दौरान उन्हें पीछे से चोट लगी और एक पुरुष पुलिसकर्मी ने उन्हें धक्का दिया।
3 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर क्या हुआ था?
यह पूरा विवाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान हुआ। प्रदर्शनकारियों की मांग थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें। प्रदर्शन का संबंध मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR) को लेकर उठाए गए सवालों से भी था। 3 अक्टूबर को प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव बढ़ा और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक उस दिन 150 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया था। इनमें AISA की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा, सामाजिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण सहित कई लोग शामिल थे। इसी दौरान महिला पत्रकारों ने पुलिस कर्मियों के खिलाफ शिकायतें दर्ज कराईं।
दिल्ली पुलिस ने कहा कि 3 अक्टूबर को नई दिल्ली इलाके में कानून-व्यवस्था की स्थिति के दौरान तीन महिला पत्रकारों ने पुलिस अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए। पुलिस के मुताबिक नई दिल्ली जिला पुलिस को शिकायतें मिलीं और निष्पक्ष एवं स्वतंत्र जांच के लिए इन्हें क्राइम ब्रांच को सौंप दिया गया।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार शिकायतकर्ताओं के बयान दर्ज किए गए और मेडिकल परीक्षण भी कराया गया। जांच में घटनास्थल के CCTV फुटेज और उपलब्ध वीडियो रिकॉर्डिंग को भी देखा जाना है। पुलिस ने लोगों से अपील की थी कि यदि उनके पास घटना से संबंधित कोई वीडियो फुटेज है तो उसे जांच एजेंसी के साथ साझा करें।
घटना के बाद शिकायतकर्ता और उनके समर्थन में पहुंचे पत्रकारों एवं कार्यकर्ताओं ने संसद मार्ग पुलिस थाने के बाहर कार्रवाई की मांग की। रिपोर्टों के अनुसार कम से कम एक शिकायत के मामले में शुरुआती दिनों में FIR दर्ज नहीं हुई थी। शिकायतकर्ता और उनके समर्थकों ने पुलिस से FIR दर्ज करने की मांग की थी। बाद में दिल्ली पुलिस ने शिकायतों को क्राइम ब्रांच को सौंपे जाने की पुष्टि की।
ACP विवेक भगत दिल्ली पुलिस में अधिकारी हैं और उस समय Connaught Place क्षेत्र में SDPO के रूप में तैनात थे। एक महिला पत्रकार की शिकायत में उनका नाम सीधे तौर पर सामने आया। मामले के सामने आने के बाद 5 अक्टूबर को उन्हें 12 Selection Grade DANIPS अधिकारियों के साथ Additional DCP के अस्थायी ड्यूटी चार्ज की सूची में शामिल किया गया था।
बाद में दिल्ली सरकार ने स्पष्ट किया कि यह अस्थायी अतिरिक्त ड्यूटी चार्ज था और इसमें कोई वित्तीय लाभ या वैधानिक पदोन्नति नहीं थी। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक विवेक भगत के अनुरोध और मामले की जांच लंबित रहने के कारण उनके अतिरिक्त DCP चार्ज को रोक दिया गया।
प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भी जताई चिंता

मामले को लेकर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने भी चिंता व्यक्त की। प्रेस क्लब की ओर से जारी बयान में एक महिला पत्रकार द्वारा पुलिस अधिकारी पर कथित यौन दुर्व्यवहार के आरोप और शिकायत पर कार्रवाई में देरी के दावे पर सवाल उठाए गए। पत्रकार संगठनों और अन्य लोगों ने इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।
राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सामने आई
मामले को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आईं। आम आदमी पार्टी के नेता सौरभ भारद्वाज ने सोशल मीडिया पर ACP विवेक भगत को लेकर सरकार और दिल्ली पुलिस पर सवाल उठाए तथा FIR दर्ज करने की मांग की। हालांकि उनके बयान में लगाए गए राजनीतिक आरोपों को स्वतंत्र तथ्य के रूप में नहीं बल्कि राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। इसी तरह अन्य राजनीतिक और सामाजिक संगठनों ने भी महिला पत्रकारों के आरोपों की निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की मांग की है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल: क्या आरोप साबित हो चुके हैं? नहीं।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि महिला पत्रकारों द्वारा लगाए गए आरोप गंभीर हैं, लेकिन अभी जांच के स्तर पर हैं। दिल्ली पुलिस ने शिकायतों को क्राइम ब्रांच को सौंपा है। जांच एजेंसी को शिकायतकर्ताओं के बयान, पुलिसकर्मियों के बयान, CCTV फुटेज, मोबाइल वीडियो और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की जांच करनी है। जब तक जांच पूरी नहीं होती, किसी आरोपी अधिकारी या पुलिसकर्मी को दोषी घोषित करना उचित नहीं होगा।
NHRC के स्वतः संज्ञान से मामले को एक नया मानवाधिकार आयाम मिला है।
आयोग ने दिल्ली पुलिस आयुक्त से दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट में पुलिस की कार्रवाई, शिकायतों पर हुई कार्रवाई और कथित घटनाओं से संबंधित तथ्यों की जानकारी मांगी जा सकती है। अब दिल्ली पुलिस की रिपोर्ट और क्राइम ब्रांच की जांच इस मामले में महत्वपूर्ण होगी।
पत्रकार सुरक्षा और पुलिस जवाबदेही का बड़ा सवाल
जंतर-मंतर की घटना ने एक साथ तीन महत्वपूर्ण मुद्दे सामने रखे हैं—महिला पत्रकारों की सुरक्षा, पुलिस कार्रवाई में जवाबदेही और शिकायतों की निष्पक्ष जांच। प्रदर्शन स्थल पर पत्रकार कानून-व्यवस्था की कवरेज करते समय पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच संवेदनशील स्थिति में काम करते हैं। ऐसे में यदि किसी पत्रकार द्वारा पुलिसकर्मी पर यौन दुर्व्यवहार या उत्पीड़न का आरोप लगाया जाता है, तो शिकायत की निष्पक्ष जांच और साक्ष्यों का संरक्षण बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। फिलहाल इस मामले में NHRC का नोटिस, दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच जांच और उपलब्ध वीडियो/CCTV साक्ष्य आगे की दिशा तय करेंगे।
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