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भ्रष्टाचारी मंत्रियों को पद से हटाने संबंधित कानून का विरोध क्यों?

(चन्दन कुमार, नई दिल्ली)-संविधान का 130 वां संशोधन विधेयक 2025 चर्चा का विषय

30 दिनों तक हिरासत मे लिए गए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यमंत्री को पद से हटाने का प्रावधान

केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम 1963 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 में भी किये जाएंगे जरूरी संशोधन

इन दिनों देश मे संविधान का 130 वां संशोधन विधेयक 2025 काफी चर्चा का विषय बना हुआ है। इस विधेयक मे यह प्रस्ताव है कि भ्रष्टाचार्य या गंभीर अपराधों के आरोप का सामना कर रहे और कम से कम 30 दिनों तक हिरासत मे लिए गए प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राज्यमंत्री को पद से हटाने का प्रावधान है। इस विधेयक मे 30 दिनों के अंदर आरोपी मंत्री को जमानत लेने का भी प्रावधान रखा गया है । इस्तीफा नहीं देने की स्थिति में 31वें दिन उसका पद स्वत: रिक्त माना जाएगा। ऐसे आरोप जिसमें कम से कम पांच साल की सजा का प्रावधान है उसमें लगातार 30 दिन जेल रहने पर या बेल नहीं मिलने पर यह कार्रवाई होगी। बेल मिलने पर दोबारा मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री बन सकता है। पूरे देश में इसे एक साथ लागू करने के लिए केंद्र शासित प्रदेश अधिनियम 1963 और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 में भी जरूरी संशोधन किये जाएंगे। इन दोनों अधिनियम में संशोधन से संबंधित विधेयक भी पेश किया गया है।
  इन विधेयक का एक मात्र उदेश्य बताया जा रहा है कि कोई भी व्यक्ति गिरफ्तार होकर जेल से प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री , केन्द्र या राज्य सरकार के मंत्री के रूप में शासन नहीं चला सकता है। यह विधेयक जैसे ही लोकसभा मे गृहमंत्री अमित शाह द्वारा 19 अगस्त को लाया गया। विपक्ष ने इस विधेयक का पुरजोर तरीके से विरोध किया। विधेयक के खिलाफ आक्रोश जताते हुए विपक्षी सांसदों ने अमित शाह की तरफ बिल की कॉपी फाड़ कर फेंक दी। वहीं, कागज के टुकड़े भी अमित शाह की ओर उछाले। अमित शाह ने ये भी कहा कि सरकार इस बिल को जेपीसी को भेजने का प्रस्ताव रखती है। उसके बाद इस विधेयक को जॉइन्ट पार्लियामेंट कामेटी के पास भेज दिया। 

अब इस विधेयक को पारित कराने की प्रक्रिया में तीन बड़ी अचड़नें हैं। नियमानुसार इसे संसद के दोनों सदनों से विशेष बहुमत के साथ पारित कराया जाना चाहिए। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत संविधान संशोधन बिल को संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में दो स्तरों पर बहुमत चाहिए। पहला, कुल सदस्यों का बहुमत और दूसरा, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत। तीसरी अड़चन आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं से भी इस बिल को पारित कराना होगा। एक संभावना यह भी बन रही है कि अगर विपक्ष संयुक्त संसदीय समिति में शामिल होता है और उसके सुझावों को सरकार मान लेती है, जिसमें यह कहा जा सकता है कि न्यायिक हिरासत की वजाय सजा होने पर ही इस्तीफे को अनिवार्य बनाया जाए, तब संभावना बन सकती है कि विपक्षी दल उसका समर्थन करें। अन्यथा इस संशोधन बिल के पारित होने की संभावना कम ही है।
अब ऐसे मे सवाल बनता है कि हर कोई भारत को भ्रष्टाचार्य से मुक्त करने की बात करता है, लेकिन जैसे ही भ्रष्टाचार्य से संबंधित कोई पहल की जाती है तो उसका विरोध क्यों? ऐसा भी तो हो सकता है कि इसपर चर्चा के लिए समय मांगा जाय। एक संतोष जनक चर्चा करने के पश्चात या अपने सुझाव देने के पश्चात इसको सर्व सहमति से स्वीकृत किया जाए।

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